शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht): उत्तराखंड की पहचान केवल उसकी बर्फ से ढकी चोटियों, पवित्र नदियों और मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं है, बल्कि उन लोगों से भी है जिन्होंने अपने जीवन को हिमालय और प्रकृति की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। इन्हीं प्रेरणादायक व्यक्तित्वों में एक नाम है शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht), जिन्होंने बहुत कम उम्र में पर्यावरण संरक्षण को अपना जीवन मिशन बना लिया।

आज जब जलवायु परिवर्तन (Climate Change), जल संकट, जंगलों में बढ़ती आग, नदियों का प्रदूषण और पहाड़ों से पलायन जैसी समस्याएँ पूरे हिमालयी क्षेत्र के सामने गंभीर चुनौती बन चुकी हैं, तब शंकर सिंह बिष्ट ने यह साबित किया है कि यदि समाज, विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान एक साथ मिल जाएँ तो प्रकृति को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
वे केवल एक पर्यावरण कार्यकर्ता नहीं हैं, बल्कि जल संरक्षण विशेषज्ञ, सामुदायिक संगठक, हिमालयी पारिस्थितिकी के शोधकर्ता और हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। उनका मानना है कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, पहचान और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। यह दृष्टिकोण उनके मिशन और कार्यों में स्पष्ट दिखाई देता है।
कौन हैं शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) ?
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के एक छोटे से गांव — चनोला — में एक बच्चा जन्मा था। उस गांव में न बड़े स्कूल थे, न चमकती सड़कें, न शहर का शोर। था तो बस पहाड़ की गोद, जंगलों की हवा, और पारंपरिक नौले का ठंडा पानी — जो बचपन से ही उसके जीवन का हिस्सा बन गया। बचपन में उन्होंने देखा कि जिन नौलों (पारंपरिक जल स्रोतों) से कभी पूरा गाँव पानी भरता था, वे धीरे-धीरे सूखने लगे। जंगलों में आग लगने की घटनाएँ बढ़ने लगीं और वर्षा का स्वरूप भी बदलने लगा। इन अनुभवों ने उनके मन में यह प्रश्न पैदा किया कि क्या आने वाली पीढ़ियाँ भी इस प्राकृतिक धरोहर का आनंद ले पाएँगी?

आज वही बच्चा शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) है — 23 वर्षीय वह युवा जिसे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने जलदूत की उपाधि दी, जिसे UCOST ने वसुंधरा अमृत सम्मान से सम्मानित किया, और जिसने एक दशक से सूखे पड़े नौले को अपनी मेहनत और संकल्प से फिर से जिंदा कर दिया।
लेकिन शंकर की कहानी केवल पुरस्कारों की नहीं है। यह एक ऐसे युवा की कहानी है जिसने अपने पहाड़, अपने जंगल और अपनी नदी को एक जिम्मेदारी की तरह थामा — न किसी NGO की नौकरी के लिए, न किसी सरकारी योजना के तहत, बल्कि इसलिए कि उसे लगा: “यह मेरी धरती है, इसकी रक्षा मेरा फर्ज है।” इसी प्रश्न ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को केवल एक विषय नहीं, बल्कि अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
Humans of Uttarakhand-hindi पर आज हम शंकर सिंह बिष्ट की उस अनकही और प्रेरणादायक यात्रा को शब्द देने की कोशिश करते हैं — जो चनोला गांव की एक छोटी पगडंडी से शुरू होकर राष्ट्रपति भवन के दरवाज़े तक पहुँची।
एक नज़र में: शंकर सिंह बिष्ट
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) |
| आयु | 23 वर्ष |
| जन्मस्थान | चनोला गांव, अल्मोड़ा, उत्तराखंड |
| शिक्षा | प्रारंभिक — गांव का स्कूल; स्नातक — जयपुर (2020) |
| पहचान | पर्यावरण कार्यकर्ता, जल संरक्षक, हिमालयी शोधकर्ता |
| कार्यक्षेत्र | रामगंगा बेसिन, कुमाऊं, गढ़वाल, हिमालयी ग्राम क्षेत्र |
| मुख्य पहचान | जलदूत (उत्तराखंड CM द्वारा), वसुंधरा अमृत सम्मान (UCOST) |
| अन्य सम्मान | मैथान रत्न पुरस्कार, गौरा देवी सम्मान 2026, हरित विस्तारक |
| सम्पर्क | nssbisht23@gmail.com |
चनोला गांव से निकला एक पहाड़ी सपना शिक्षा और जीवन की नई दिशा
शंकर का जन्म और बचपन उत्तराखंड के उस असली पहाड़ी जीवन में बीता, जो अधिकांश लोग केवल किताबों और यात्रा-वृत्तांतों में पढ़ते हैं। अल्मोड़ा जिले के सुदूर गांव चनोला में, जहाँ जंगल और खेत घर के दरवाज़े से शुरू होते थे, वहाँ शंकर ने पहाड़ी जीवन को उसके सच्चे रूप में जिया।
गांव के स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद शंकर ने उच्च शिक्षा के लिए जयपुर का रुख किया — जहाँ से उन्होंने 2020 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। लेकिन शहर की चमक-दमक ने उनके मन को नहीं बदला। वे वापस आए — अपने पहाड़ पर, अपनी मिट्टी पर, अपनी जिम्मेदारी की ओर।
शंकर कहते हैं: “पाँच प्राकृतिक तत्व — जल, वायु, मिट्टी, आकाश और अग्नि — ये जीवन की आधारशिला हैं। आज पर्यावरण का विनाश इस प्राचीन संतुलन को तोड़ रहा है। मेरा काम इस संतुलन को फिर से बहाल करना है — समुदाय-चालित, शोध-आधारित और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े समाधानों के ज़रिए।” यह कोई किताबी भाषण नहीं — यह उस युवा का जीवन-दर्शन है जो अपने हाथों से नौला खोदता है, खाल बनाता है और जंगल में पेड़ लगाता है।
एक युवा पर्यावरण कार्यकर्ता का विचार-जगत: “पर्यावरण काम नहीं, जिम्मेदारी है”

शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) की सोच को समझने के लिए उनके शब्दों पर ध्यान देना ज़रूरी है। वे कहते हैं: “मेरे लिए पर्यावरण-कार्य एक पेशा नहीं — यह मेरी धरती, मेरी संस्कृति और भावी पीढ़ियों के प्रति एक जिम्मेदारी है।”
यह बात उन्हें सिर्फ एक कार्यकर्ता से अलग बनाती है। अधिकांश पर्यावरण आंदोलन या तो विरोध-प्रदर्शन पर केंद्रित होते हैं या फिर बड़े-बड़े सेमिनारों तक सीमित। शंकर का रास्ता अलग है — वे समाधान-केंद्रित हैं। उनका विश्वास है कि पहाड़ की समस्याओं का हल पहाड़ में ही है — पारंपरिक ज्ञान में, स्थानीय समुदाय में और प्रकृति की अपनी उपचार-शक्ति में।
जब वे जयपुर से पढ़कर वापस आए, तो उनके पास डिग्री थी लेकिन उनका लक्ष्य नौकरी खोजना नहीं था। उन्होंने अपने गांव की उस ज़मीन को देखा जो धीरे-धीरे बंजर हो रही थी, उन नौलों को देखा जो सूख रहे थे और उन जंगलों को देखा जो जल रहे थे — और उन्होंने तय किया कि वे इसे बदलेंगे शंकर की यात्रा यह भी बताती है कि उत्तराखंड के युवाओं के लिए पलायन ही एकमात्र विकल्प नहीं है। जो व्यक्ति अपनी धरती को पहचानता है, उसे उसमें अनंत संभावनाएं दिखती हैं — रोजगार की भी और सेवा की भी।
आज बहुत से लोग पर्यावरण संरक्षण की बात करते हैं, लेकिन शंकर सिंह बिष्ट के लिए यह केवल एक अभियान नहीं बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी है।
वे मानते हैं कि—
- यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे।
- यदि जल स्रोत सुरक्षित रहेंगे तो खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
- यदि गाँव मजबूत होंगे तो पलायन कम होगा।
- यदि हिमालय सुरक्षित रहेगा तो पूरे उत्तर भारत की जल सुरक्षा मजबूत होगी।
जल संरक्षण और वन पुनरुद्धार: पहाड़ की प्यास बुझाने का संकल्प
शंकर का सबसे व्यापक और गहरा काम जल संरक्षण के क्षेत्र में है। उन्होंने खानसर घाटी, गेवाड़ घाटी, सुमेश्वर घाटी और अनेक गांवों — भटकोट, चनौला, खजौरानी, नैगर, बगड़ी, नाग, छनि, जमनिया, झुमाखेत — में अथक काम किया है।
खाल, चाल और खनती: पुरखों की पारंपरिक जल-विद्या को नया जीवन
उत्तराखंड के पहाड़ों में सदियों पहले हमारे पूर्वजों ने एक अनोखी जल-प्रबंधन व्यवस्था विकसित की थी:
- खाल — जंगल में खोदी गई बड़ी खाइयाँ जो बारिश का पानी रोककर जमीन में सोखती हैं।
- चाल — पहाड़ी ढलान पर बनाई गई समोच्च खाइयाँ (Contour trenches) जो पानी को रोकती हैं।
- खनती — छोटी-छोटी खुदाई जो वर्षाजल को भूमिगत करती है।
इन पारंपरिक संरचनाओं को पिछले कई दशकों में उपेक्षा और आधुनिकता की आँधी में भुला दिया गया था। शंकर ने इन्हें फिर से ज़िंदा किया।
उन्होंने पानी की मात्रा घटाने में जिम्मेदार पाइन के जंगलों में मिश्रित देशी प्रजातियों के पेड़ लगाने का काम किया। पाइन के पेड़ एक विशेष समस्या हैं — इनकी पत्तियाँ जमीन में पानी को जाने नहीं देतीं और जंगल में आग के लिए ईंधन बनती हैं। शंकर ने इस समस्या को समझते हुए देशी प्रजातियों की मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया।
साथ ही मिट्टी स्थिरीकरण, जलग्रहण क्षेत्र पुनरुद्धार और पारिस्थितिकीय जल-विज्ञान के काम भी चले। समुदायों को विकेंद्रीकृत जल संरक्षण के लिए तैयार किया गया — यानी हर गांव अपने जंगल और पानी का खुद मालिक।
नन्होई नौला: एक दशक बाद फिर छलका पानी
यह शंकर के काम की सबसे भावुक और प्रेरणादायक कहानी है। भटकोट गांव में एक पारंपरिक नौला था — नन्होई नौला। नौला यानी पहाड़ों की वह परंपरागत पानी की बावड़ी, जो भूजल से भरती है और जिसके पानी को पहाड़ के लोग वर्षों से पवित्र मानते आए हैं। लेकिन एक दशक से भी पहले यह नौला पूरी तरह सूख गया था। गांव की महिलाओं को दूर से पानी लाना पड़ता था। पुराने लोग उस नौले को याद करते थे लेकिन उम्मीद खो चुके थे।
शंकर ने वह उम्मीद जगाई। तीन साल की निरंतर मेहनत। जलग्रहण क्षेत्र में खाल-खनती का निर्माण। देशी पेड़ों का रोपण ताकि मिट्टी में नमी बढ़े। जंगल की आग को रोककर प्राकृतिक वनस्पति को पुनर्जीवित होने दिया। ये सब प्रकृति-आधारित हस्तक्षेप थे — बिना किसी बड़ी मशीन के, बिना करोड़ों के बजट के। और फिर एक दिन — एक दशक से अधिक समय बाद — नन्होई नौला में पानी लौट आया।
यही नहीं, आसपास के अन्य नौलों और प्राकृतिक झरनों का जलस्तर भी बढ़ा — जो दर्शाता है कि पूरे क्षेत्र का भूजल तंत्र पुनर्जीवित हो रहा है। यह केवल एक नौले की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की जीत है कि यदि हम प्रकृति को मौका दें, वह खुद को ठीक कर लेती है।
300 किलोमीटर की रामगंगा यात्रा: एक नदी, एक दस्तावेज़
शंकर ने जो सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी कार्य किया, वह था पश्चिमी रामगंगा की उद्गम-संगम शोध पादयात्रा — 300 किलोमीटर की वह पैदल यात्रा जो किसी एकल व्यक्ति की साहसिक कोशिश नहीं, बल्कि एक जीवंत वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण अभियान था।
रामगंगा नदी के उद्गम स्थल से लेकर मार्चुला (संगम) तक — लगभग 11 दिनों में — यह पूरी यात्रा पैदल तय की गई। रास्ते में घने जंगल, दुर्गम पहाड़ी इलाके, दूर-दराज़ के गांव, और रामगंगा की सहायक नदियों के उद्गम बिंदु शामिल थे। इस यात्रा में 50 से अधिक शोधकर्ता, पर्यावरणविद और प्रोफेसर शामिल हुए — विभिन्न राज्यों और शैक्षणिक संस्थानों से। यह एक सामूहिक प्रयास था जिसमें शंकर ने नेतृत्व की भूमिका निभाई।
इस यात्रा में कई महत्वपूर्ण विषयों पर शोध और दस्तावेज़ीकरण हुआ:
- जलग्रहण पारिस्थितिकी और जलविज्ञान — रामगंगा और उसकी सहायक नदियों के जलस्रोतों की वर्तमान स्थिति का आकलन।
- नदी जैव-विविधता और आवास मूल्यांकन — कौन-कौन सी प्रजातियाँ नदी में और उसके आसपास जीवित हैं, और उनकी स्थिति क्या है।
- सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत — रामगंगा घाटी से जुड़ी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोक-जीवन की कहानियाँ।
- जलवायु परिवर्तन का प्रभाव — किस तरह बदलता मौसम और भूमि-उपयोग में बदलाव नदी को प्रभावित कर रहे हैं।
- मानवीय खतरों का दस्तावेज़ीकरण — अतिक्रमण, खनन, प्रदूषण और वन-कटाई से रामगंगा को कितना नुकसान हो रहा है।
- स्थानीय ज्ञान प्रणालियाँ — गांव के बुजुर्गों से नदी, जंगल और पानी से जुड़े परंपरागत ज्ञान को सुनना और दर्ज करना।
यह यात्रा पश्चिमी रामगंगा बेसिन का एक दुर्लभ समुदाय-संचालित पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक दस्तावेज़ बनी। इसके ज़रिए एक ऐसा डेटाबेस तैयार हुआ जो सरकारी नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और संरक्षण कार्यकर्ताओं के लिए एक मूल्यवान संसाधन है।
700 किलोमीटर की पदयात्रा: चनौला से राष्ट्रपति भवन तक
अप्रैल 2022 में शंकर ने वह किया जो केवल असाधारण इरादे वाले लोग करते हैं। चनौला गांव से राष्ट्रपति भवन, दिल्ली तक — 700 किलोमीटर की पदयात्रा। पैरों में जूते, मन में संकल्प और हाथ में एक माँग — जंगल की आग को रोकने के लिए मजबूत नीतियाँ और सामुदायिक भागीदारी।
उत्तराखंड में हर साल गर्मियों में जंगल जलते हैं। ये आग न केवल पेड़ों को नष्ट करती है, बल्कि भूजल को सुखाती है, जैव-विविधता को खत्म करती है और पहाड़ी समुदायों की आजीविका को तबाह करती है। सरकारी तंत्र अपनी जगह काम करता है, लेकिन बिना समुदाय की भागीदारी के जंगल नहीं बचते। शंकर ने यह बात दिल्ली की सड़कों पर चलकर कही। एक युवा पहाड़ी का यह साहसिक कदम देश भर में चर्चा का विषय बना।
जगेश्वर के 1000 देवदार: एक पेड़ की रक्षा, एक संस्कृति की रक्षा
जगेश्वर — उत्तराखंड का वह प्राचीन धाम जहाँ देवदार के हज़ार साल पुराने पेड़ प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम बनाते हैं। यहाँ के देवदार के जंगल को न केवल पारिस्थितिकीय, बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर 1,000 से अधिक देवदार के पेड़ काटे जाने की तैयारी हो रही थी।
जब शंकर को यह खबर मिली, तो वे चुप नहीं बैठे। उन्होंने स्थानीय समुदाय को संगठित किया, जागरूकता फैलाई और एक शांतिपूर्ण जन आंदोलन खड़ा किया। जगेश्वर में हज़ारों की संख्या में लोग एकत्र हुए — बुजुर्ग, महिलाएं, युवा — सब एक आवाज़ में बोले: “देवदार नहीं काटने देंगे।”
और वह आंदोलन सफल रहा। पेड़ों की कटाई रुकी। यह केवल 1000 पेड़ों की लड़ाई नहीं थी। यह उस सोच के खिलाफ लड़ाई थी जो विकास के नाम पर प्रकृति की अनदेखी करती है। यह घटना उत्तराखंड में लोक-नेतृत्व से वन-संरक्षण की एक मिसाल बन गई।
समुदाय-आधारित संरक्षण: विद्यार्थी आओ नर्सरी और प्रकृति माँ रविवार
शंकर का मानना है कि पर्यावरण-संरक्षण केवल बड़े लोगों का काम नहीं — यह बच्चों से शुरू होता है।
विद्यार्थी आओ नर्सरी
इस अनूठी पहल में स्कूली बच्चों को देशी पौधों की नर्सरी तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। बच्चे न केवल पौधे उगाते हैं, बल्कि जैव-विविधता, मिट्टी और जल के आपसी संबंध को भी समझते हैं। यह पर्यावरण-शिक्षा का वह व्यावहारिक रूप है जो किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं मिलता।
प्रकृति माँ रविवार
हर रविवार — स्वयंसेवकों के साथ — पेड़ लगाना, झरना साफ करना और नदी के किनारे की सफाई। यह साप्ताहिक अभियान बताता है कि पर्यावरण सेवा एक आदत है, आयोजन नहीं।
टिकाऊ आजीविका: जब पर्यावरण-संरक्षण और रोजी-रोटी एक साथ चलें
शंकर जानते हैं कि केवल जंगल और नदी बचाने की बात करने से पेट नहीं भरता। इसलिए उन्होंने पर्यावरण-संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ आजीविका के मॉडल भी विकसित किए।
मशरूम की खेती — भटकोट में महिला उद्यमिता
भटकोट में विशेषज्ञ प्रीति भंडारी (अल्मोड़ा) के नेतृत्व में दो दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण आयोजित किया गया। महिलाओं को घर पर ही मशरूम उगाने की तकनीक सिखाई गई ताकि वे घर बैठे आय अर्जित कर सकें।
एकीकृत कृषि मॉडल
शंकर ने एक समग्र कृषि मॉडल तैयार किया जिसमें एक साथ शामिल हैं:
- नर्सरी विकास — देशी पेड़ों के पौधे
- डेयरी — पारंपरिक पशुपालन
- मुर्गीपालन — स्थानीय नस्लें
- सब्जी खेती — जैविक तरीके से
- मत्स्यपालन — नदी और तालाब-आधारित
यह एकीकृत मॉडल पहाड़ी परिवारों को साल भर आय का स्रोत देता है और किसी एक फसल पर निर्भरता से मुक्त करता है।
धुरफट: पहाड़ी डेयरी की वापसी
धुरफट — यह पारंपरिक हिमालयी डेयरी की पहचान है। शंकर इस परंपरागत डेयरी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहे हैं — न केवल सांस्कृतिक गौरव के लिए, बल्कि स्थानीय खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए भी।
पारंपरिक मधुमक्खी पालन और बहुफूल शहद
शायद शंकर की सबसे अनोखी और सुंदर पहल है — पारंपरिक हिमालयी मधुमक्खी पालन का पुनरुद्धार।
पहाड़ों में सदियों से लकड़ी के लट्ठों में मधुमक्खी पालन की परंपरा रही है। शंकर ने इसे फिर से प्रोत्साहित किया:
- परिवारों को देशी लकड़ी के छत्ते में मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण
- रसायन-मुक्त, प्राकृतिक शहद निष्कर्षण की विधियाँ
- हिमालयी बहुफूल शहद के लिए बाज़ार संपर्क विकसित करना
- स्थानीय मधुमक्खी प्रजातियों का संरक्षण
- परागण-अनुकूल आवास का विस्तार
यह पहल एक साथ तीन काम करती है — पारिस्थितिकी तंत्र बचाती है, परंपरागत ज्ञान जीवित रखती है, और परिवारों को टिकाऊ आय देती है।
वन-अग्नि नियंत्रण: चौखुटिया के जंगलों की रक्षा
चौखुटिया क्षेत्र में जंगल की आग — उत्तराखंड की एक पुरानी और गंभीर समस्या। शंकर सक्रिय रूप से जंगल की आग के नियंत्रण कार्य में लगे रहे हैं। वे यह भी जानते हैं कि आग लगने के बाद बुझाना पर्याप्त नहीं — उससे पहले समुदाय को जागरूक करना और वन-प्रबंधन में उन्हें शामिल करना ज़रूरी है। यही कारण था कि उन्होंने अपनी 700 किलोमीटर की पदयात्रा में इसी माँग को केंद्र में रखा।

उत्तराखंड के जंगलों में आग की समस्या की जड़ें गहरी हैं। पाइन की पत्तियाँ — जिन्हें स्थानीय रूप से “पिरूल” कहा जाता है — जंगल की ज़मीन पर मोटी परत बनाती हैं। यह परत न केवल पानी को जमीन में नहीं जाने देती, बल्कि सूखी और अत्यंत ज्वलनशील भी होती है। गर्मी के मौसम में एक चिंगारी पूरे जंगल को लपेट लेती है।
शंकर का मानना है कि इस समस्या का समाधान दमकल गाड़ियों में नहीं, बल्कि जागरूक समुदाय में है। जब हर गांव का एक व्यक्ति अपने आसपास के जंगल का रखवाला बने, तो आग फैलने से पहले ही बुझाई जा सकती है।
शंकर का संदेश: उत्तराखंड के युवाओं के नाम
यदि शंकर सिंह बिष्ट उत्तराखंड के अपने समवयस्क युवाओं से कुछ कहना चाहते हैं, तो वह शायद यही होगा: “पहाड़ में समस्याएं हैं — यह सच है। लेकिन समाधान भी पहाड़ में ही हैं। हम अपनी धरती को समझें, अपने पुरखों के ज्ञान को जानें और अपने समुदाय के साथ मिलकर काम करें — तो बदलाव होता है, हम दोनों ने देखा है।”
“पलायन एकमात्र विकल्प नहीं है। पहाड़ में रहकर भी एक सार्थक जीवन जिया जा सकता है — अगर हम अपनी ज़मीन से प्रेम करें और उसे एक जिम्मेदारी की तरह लें।” “प्रकृति हमें कुछ नहीं माँगती। वह बस चाहती है कि हम उसे तबाह करना बंद करें — और जब हम ऐसा करते हैं, तो वह खुद अपनी देखभाल कर लेती है।” यह संदेश केवल उत्तराखंड के युवाओं के लिए नहीं — यह पूरे देश के उन युवाओं के लिए है जो अपनी जड़ों से दूर होकर खुद को खो रहे हैं।
पुरस्कार और सम्मान: पहाड़ ने पहचाना अपने बेटे को
शंकर का काम केवल ज़मीन पर नहीं, देश के सर्वोच्च संस्थानों तक भी पहुँचा।

- जलदूत सम्मान — उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा : जलदूत — जल का दूत। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने शंकर को यह उपाधि दी — उनके जल संरक्षण कार्यों को राज्य स्तर पर मान्यता देते हुए। यह सम्मान उस कोशिश की आधिकारिक स्वीकृति थी जो शंकर बिना किसी सरकारी नौकरी के वर्षों से कर रहे थे।
- वसुंधरा अमृत सम्मान — UCOST : उत्तराखंड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र (UCOST) ने शंकर को वसुंधरा अमृत सम्मान प्रदान किया। यह सम्मान उत्तराखंड में पर्यावरण और विज्ञान के क्षेत्र में असाधारण योगदान के लिए दिया जाता है।
- मैथान रत्न पुरस्कार : पारिस्थितिकी संरक्षण में उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें मैथान रत्न पुरस्कार से नवाज़ा गया।
- गौरा देवी सम्मान 2026 : गौरा देवी — वही महिला जिन्होंने 1974 में चिपको आंदोलन को नई ऊर्जा दी थी और जो उत्तराखंड में पर्यावरण-संरक्षण की प्रतीक बन गईं। उन्हीं के नाम पर गौरा देवी सम्मान 2026 से शंकर सिंह बिष्ट को सम्मानित किया गया — यह उनके काम का शायद सबसे भावुक सम्मान है।
- साहपती फाउंडेशन की डॉक्युमेंट्री : शंकर के जल संरक्षण कार्यों पर साहपती फाउंडेशन ने एक डॉक्युमेंट्री बनाई, जो उनके काम को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाती है।
- हरित विस्तारक — राष्ट्रीय स्तर पर पहचान : मानव रचना विश्वविद्यालय, IAM अहमदाबाद, PSG, ऋषिवुड विश्वविद्यालय और BSG जैसे संस्थानों ने शंकर को हरित विस्तारक (Harit Vistarak) के रूप में मान्यता दी — जो यह दर्शाता है कि उनके काम का प्रभाव अब शैक्षणिक और संस्थागत स्तर पर भी महसूस किया जा रहा है।
उत्तराखंड की जल-संकट की वास्तविकता और शंकर का समाधान
उत्तराखंड के गांवों में जल संकट एक चुप्पी से फैली महामारी की तरह है। पिछले दो-तीन दशकों में यहाँ के हज़ारों नौले, झरने और धारे सूख चुके हैं। कारण कई हैं — अनियंत्रित जंगल की कटाई, पाइन के एकल-प्रजाति जंगल जो पानी को जमीन में नहीं जाने देते, जंगल की आग जो मिट्टी की नमी को नष्ट करती है, और जलवायु परिवर्तन जो बारिश के पैटर्न को बदल रहा है। इसका सबसे बड़ा बोझ पहाड़ की महिलाओं पर पड़ता है। जब नज़दीकी नौला या धारा सूखता है, तो घंटों दूर पानी लाने का काम उन्हीं के हिस्से आता है।
शंकर ने इस समस्या को उसकी जड़ से समझा। उन्होंने जाना कि:
- जंगल और पानी का रिश्ता अटूट है — जहाँ घने जंगल हैं, वहाँ भूजल भी है। जहाँ जंगल कटे हैं या जले हैं, वहाँ नौले सूखते हैं।
- पारंपरिक संरचनाएं वैज्ञानिक हैं — हमारे पुरखों ने खाल, चाल और खनती इसलिए नहीं बनाए कि उन्हें परंपरा निभानी थी — बल्कि इसलिए कि यह पानी रोकने का सबसे प्रभावी तरीका था।
- समुदाय ही असली रक्षक है — कोई भी सरकारी योजना तब तक टिकाऊ नहीं जब तक स्थानीय समुदाय उसका स्वामी न बने।
इन तीन सत्यों पर शंकर ने अपना पूरा काम खड़ा किया है।
शंकर का दर्शन: पाँच तत्वों का रक्षक
शंकर सिंह बिष्ट एक दार्शनिक सोच के साथ काम करते हैं। उनका मानना है: “जल, वायु, मिट्टी, आकाश और अग्नि — ये पाँच तत्व जीवन की नींव हैं। आज इन सभी पर संकट है। मेरा काम इस संकट से लड़ना है — लेकिन समुदाय के साथ मिलकर, परंपरागत ज्ञान के साथ और प्रकृति को केंद्र में रखकर।” यह सोच उन्हें उन पर्यावरण-कार्यकर्ताओं से अलग बनाती है जो केवल विरोध करते हैं। शंकर निर्माण करते हैं — खाल खोदकर, नौला जिंदा करके, नर्सरी उगाकर, शहद की मक्खी पालकर और बच्चों को पेड़ लगाना सिखाकर। उनके लिए पर्यावरण-कार्य एक जिम्मेदारी है — न पेशा, न शौक। यह उनकी धरती के प्रति, उनकी संस्कृति के प्रति और आने वाली पीढ़ियों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता है।
शंकर की प्रेरणा: वे लोग और वे पल जिन्होंने उन्हें बनाया
हर महान कार्यकर्ता के पीछे कुछ ऐसे पल और कुछ ऐसे लोग होते हैं जिन्होंने उन्हें रास्ता दिखाया। शंकर के लिए वह प्रेरणा उनके गांव की उन बुजुर्ग महिलाएं हैं जो सिर पर पानी का घड़ा लेकर मीलों चलती थीं क्योंकि नौला सूख गया था। वह दृश्य उनके दिल में अंकित हो गया और उसी से उनके काम की शुरुआत हुई।
- प्रेरणा मिली गौरा देवी से — वह अदम्य महिला जिसने 1974 में चिपको आंदोलन में पेड़ों से लिपटकर उन्हें बचाया था। आज शंकर गौरा देवी सम्मान से नवाज़े गए हैं — यह एक वृत्त का पूरा होना है।
- प्रेरणा मिली उस सिलबट्टे से जिस पर उनकी माँ पिस्यूं लूण पीसती थीं — उस पारंपरिक ज्ञान से जो पहाड़ी जीवन की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का उत्तर देता था।
- और प्रेरणा मिली उस रामगंगा से — जिसके किनारे उनका बचपन बीता, जिसकी कलकल सुनकर वे बड़े हुए और जिसे आज वे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
शंकर के काम का भविष्य: एक बीज, अनेक फल
शंकर सिंह बिष्ट के काम का असर एक पीढ़ी तक नहीं रुकेगा। जो बच्चे आज “विद्यार्थी आओ नर्सरी” में पौधे उगाना सीख रहे हैं, वे कल के वन-रक्षक बनेंगे। जो महिलाएं आज मशरूम उगाकर और शहद बेचकर आत्मनिर्भर बन रही हैं, वे अपने बच्चों को पर्यावरण-प्रेम की शिक्षा देंगी।
जो नौला एक बार सूखकर फिर भरा, वह अगली पीढ़ी को याद दिलाएगा कि प्रकृति में अपार शक्ति है — बस उसे मौका चाहिए। और जो जंगल आज बच रहे हैं, वे आने वाले दशकों में उत्तराखंड के जल-स्रोतों की रक्षा करेंगे। शंकर का काम एक बीज की तरह है — जो आज छोटा दिखता है लेकिन जिसमें एक पूरे जंगल की संभावना है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
शंकर सिंह बिष्ट के काम और उनकी पहलों के बारे में अक्सर कुछ सवाल पूछे जाते हैं। यहाँ उनके उत्तर दिए गए हैं ताकि उनके काम को और बेहतर ढंग से समझा जा सके:
शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) कौन हैं
उत्तर: शंकर सिंह बिष्ट अल्मोड़ा, उत्तराखंड के 23 वर्षीय जमीनी पर्यावरण कार्यकर्ता हैं जो हिमालयी पारिस्थितिकी संरक्षण, जल संरक्षण, सामुदायिक आजीविका और परंपरागत ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण पर काम करते हैं।
शंकर सिंह बिष्ट को जलदूत क्यों कहा गया?
उत्तर: उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने उनके उत्कृष्ट जल संरक्षण कार्यों — खाल-खनती निर्माण, नौला पुनर्जीवन और रामगंगा संरक्षण — के लिए उन्हें जलदूत की उपाधि प्रदान की।
नौला क्या है?
नौला उत्तराखंड, विशेष रूप से कुमाऊँ क्षेत्र, की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणाली है। यह प्राकृतिक भूमिगत जल (Groundwater) को सुरक्षित रखने और लोगों तक स्वच्छ पेयजल पहुँचाने के लिए पत्थरों से बनाई गई एक विशेष संरचना होती है। नौले का निर्माण इस प्रकार किया जाता है कि पहाड़ के भीतर से रिसने वाला प्राकृतिक पानी धीरे-धीरे एक छोटे जलकुंड में एकत्र होता रहे। इससे वर्ष भर लोगों को ठंडा, स्वच्छ और मीठा पानी उपलब्ध होता है।
जगेश्वर देवदार बचाओ आंदोलन क्या था?
जगेश्वर में सड़क चौड़ीकरण के लिए 1000 से अधिक पवित्र देवदार पेड़ काटे जाने थे। शंकर ने समुदाय को एकजुट करके एक शांतिपूर्ण जन-आंदोलन खड़ा किया जिससे वृक्षों की कटाई रुकी — यह उत्तराखंड में लोक-नेतृत्व से वन-संरक्षण की मिसाल बनी।
शंकर सिंह बिष्ट को मिले प्रमुख पुरस्कार कौन से हैं?
जलदूत (CM उत्तराखंड), वसुंधरा अमृत सम्मान (UCOST), मैथान रत्न पुरस्कार, गौरा देवी सम्मान 2026, हरित विस्तारक (मानव रचना विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान), साहपती फाउंडेशन डॉक्युमेंट्री।
शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) का यह सफर हमें याद दिलाता है कि बड़े बदलाव हमेशा बड़े शहरों या बड़े बजट से नहीं आते। वे आते हैं उस व्यक्ति से जो एक सूखे नौले के सामने खड़ा होकर यह तय करता है कि वह उसे फिर से भरेगा — और फिर तीन साल तक उसी संकल्प पर डटा रहता है जब तक नौले में पानी नहीं आ जाता। उत्तराखंड को ऐसे ही शंकरों की ज़रूरत है — सैकड़ों, हज़ारों। और शायद शंकर की कहानी पढ़कर कोई और युवा यह तय करे कि वह भी अपनी धरती के लिए ऐसा ही कुछ करेगा।
Humans of Uttarakhand पर हम ऐसे ही उत्तराखंड के असली नायकों की कहानियाँ लाते रहेंगे — जो किसी सुर्खी में नहीं, बल्कि जंगलों, नदियों और खेतों में मिलते हैं। यदि आप शंकर सिंह बिष्ट (Shankar Singh Bisht) के काम से प्रेरित हैं, तो उनसे संपर्क करें और उनके अभियान में भागीदार बनें। अगर यह लेख आपको पसंद आया हो, तो इसे शेयर करें और अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें। अगर आपको कोई गलती या अधूरी जानकारी दिखे, या आपके पास कोई सुझाव हो, तो हमें humanofuttrakhand@gmail.com पर ईमेल करें। आपकी प्रतिक्रिया हमें बेहतर बनाने में मदद करती है।




